Author Topic: Yoga For all  (Read 36 times)

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Yoga For all
« on: December 16, 2016, 12:19:57 am »
According to a 2003 study by Yoga Journal, over 15 million Americans now practice yoga, and the number is growing. Yoga is perhaps the perfect form of exercise, for in addition to toning and stretching muscles, it works to balance every system of the body. It also calms the mind and reduces stress. And you don't need to twist yourself into a pretzel, or even get down on a mat, to reap the many benefits of this ancient practice. And with Chair yoga, all you need is a chair, your breath, and the willingness to learn. Chair yoga has become more and more common as people with disabilities are realizing the benefits and accessibility of yoga.   


Lakshmi Voelker Binder, a yogini with nearly 40 years of experience, developed Lakshmi Voelker Chair Yoga: The Sitting Mountain Series in 1987 when one of her students, Candace Terry, found she could no longer get down on the floor to do yoga because of worsening arthritis symptoms.



Accessible to Everyone

"I wanted to develop a style of yoga that would be accessible to everyone, regardless of their physical condition," explains Lakshmi. "With Chair Yoga, everyone, regardless of age or ability, can benefit from yoga."

After Candace began practicing Lakshmi's chair asanas (poses), she quickly became stronger and more flexible. Within six months of daily practice, Candace regained the strength and vitality to attend regular yoga classes again.


Yoga Benefits

Besides being a great stress reliever, yoga activates the parasympathetic nervous system, which is the opposite of the flight-or-flight (sympathetic) system we easily fall into. The gentle flow of breath and movement calms the mind, increases blood circulation, improves strength, reduces muscle tension, and enhances respiration. It's also grounding, improves focus, and helps people become more in touch with themselves and what they need.

"Many of us live with our sympathetic nervous system activated to some extent nearly all the time," explains Lakshmi. "Deep breathing reminds our bodies of what it feels like to deeply relax." And once we relax, we become more clear-headed and productive.


Benefits for People with Disabilities

For people with disabilities, yoga offers additional benefits, including improving gross motor skills; developing self-esteem; improving communication, listening, and relationship skills; and helping people discover their unique qualities in a non-competitive atmosphere.


And, for those in wheelchairs, Chair Yoga enhances one's friendship with the chair by making it more of an extension of his or her body.
Almost any yoga pose can be modified to be practiced in a chair, and Lakshmi encourages all her students to be creative and do the best they can with the limitations they currently have. Any style of chair can be used for chair yoga, though a sturdy armless chair works best.

For those who spend their days in a wheelchair, arm and leg rests may be removed, or kept in place as needed.
"The only limitations of doing yoga in a wheelchair are the individual's physical limitations, " says Lakshmi, who quickly points out that she rarely uses the word "limitation. "


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Re: Yoga For all
« Reply #1 on: December 16, 2016, 12:20:55 am »
योग का प्रारंभ

वैदिक काल में यज्ञ और योग का बहुत महत्व था। यह अनुमान भगवान शंकर की बैठने की मुद्रा को देखकर लगाया जा सकता है। भगवान शंकर के बाद वैदिक ऋषि-मुनियों से ही योग का प्रारंभ माना जाता है। बाद में कृष्ण, महावीर और बुद्ध ने इसे अपनी तरह से विस्तार दिया। इसके पश्चात पातंजलि ने इसे सुव्यवस्थित रूप दिया।
इस रूप को ही आगे चलकर सिद्धपंथ, शैवपंथ, नाथपंथ वैष्णव और शाक्त पंथियों ने अपने-अपने तरीके से विस्तार दिया। इसके लिए उन्होंने चार आश्रमों की व्यवस्था निर्मित की। ब्रह्मचर्य आश्रम में वेदों की शिक्षा के साथ ही शस्त्र और योग की शिक्षा भी दी जाती थी। ऋग्वेद को 1500 ईसा पूर्व से 1000 ईसा पूर्व के बीच लिखा गया माना जाता है। इससे पूर्व वेदों को कंठस्थ कराकर हजारों वर्षों तक स्मृति के आधार पर संरक्षित रखा गया।
संसार की प्रथम पुस्तक ऋग्वेद में कई स्थानों पर यौगिक क्रियाओं के विषय में उल्लेख मिलता है।
योग के बिना विद्वान का भी कोई यज्ञकर्म सिद्ध नहीं होता। वह योग क्या है, योग चित्तवृत्तियों का निरोध है। वह कर्तव्य कर्ममात्रा में व्याप्त है। योगाभ्यास का प्रामाणिक चित्रण लगभग 3000 ईसा पूर्व सिन्धु घाटी सभ्यता के समय की मोहरों और मूर्तियों में मिलता है। हिंदू, जैन और बौद्ध धर्म में योग का अलग-अलग तरीके से वर्गीकरण किया गया है। इन सबका मूल वेद और उपनिषद ही रहा है। भारतीय दर्शन के मान्यता के अनुसार वेदों को अपौरुषेय माना गया है अर्थात वेद परमात्मा की वाणी है तथा इन्हें करीब दो अरब वर्ष पुराना माना गया है।
563 से 200 ईसा पूर्व योग के तीन अंग तपो स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान का प्रचलन था। इसे क्रिया योग कहा जाता है। जैन और बौद्ध जागरण और उत्थान काल के दौर में यम और नियम के अंगों पर जोर दिया जाने लगा। यम और नियम अर्थात अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अस्तेय, अपरिग्रह, शौच, संतोष, तप और स्वाध्याय का प्रचलन ही अधिक रहा।

यहां तक योग को सुव्यवस्थित रूप नहीं दिया गया था। पहली दफा 200 ईसा पूर्व पातंजलि ने वेद में बिखरी योग विद्या का सही-सही रूप में वर्गीकरण किया। पातंजलि के बाद योग का प्रचलन बढ़ा और यौगिक संस्थानों, पीठों तथा आश्रमों का निर्माण होने लगा, जिसमें सिर्फ राजयोग की शिक्षा-दीक्षा दी जाती थी। योग परम्परा और शास्त्रों का विस्तृत इतिहास रहा है। हालांकि इसका इतिहास दफन हो गया है अफगानिस्तान और हिमालय की गुफाओं में और तमिलनाडु तथा असम सहित बर्मा के जंगलों की कंदराओं में।
जिस तरह राम के निशान इस भारतीय उपमहाद्वीप में जगह-जगह बिखरे पड़े हैं उसी तरह योगियों और तपस्वियों के निशान जंगलों, पहाड़ों और गुफाओं में आज भी देखे जा सकते हैं। बस जरूरत है भारत के उस स्वर्णिम इतिहास को खोज निकालने की जिस पर हमें गर्व है।


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Re: Yoga For all
« Reply #2 on: December 16, 2016, 12:21:34 am »
योग से क्‍या तात्‍पर्य है ?

योग शब्‍द संस्‍कृत की युज् धातु से बना है जि‍सका अर्थ है जोड़ना. अध्‍यात्‍म में इसके द्वारा साधक शरीर को आत्‍मा से जोड़ते हैं और वैयक्‍ति‍क आत्‍मा को वि‍श्‍वात्‍मा से एकाकार करते हैं.


हठ योग प्रदीपिका

प्रथमोपदेशः

भगवान शिव जी को प्रणाम है, जिन्होंने सबसे पहले हठ योग का ज्ञान इस संसार को दिया । यह ज्ञान एक सीढी के समान है, जो एक साधक को राज योग की ऊँचाई तक पहुँचा देता है ।

योगी स्वात्माराम अपने गुरु श्रीनाथ को प्रणाम कर राज योग की प्राप्ति हेतु हठ योग के बारे में बताते हैं ।
राज योग के बारे में बहुत से मत भेद होने के कारण जो अज्ञान रूपी अन्धकार फैला हुआ है, जिसके कारण समान्य जान राज योग के सही सही जान नहीं पा रहे हैं । उन पर कृपा कर स्वात्माराम जी हठ योग प्रदीपिका रूपी रौशनी से इस अन्धकार को मिटाते हैं ।

मत्स्येन्द्र, गोरक्ष आदि सब हठ योग के ज्ञाता थे, और उन की कृपा से स्वात्माराम जी ने भी उनसे इसे सीखा ।
पूर्व काम में ये सिद्ध महात्मा हुये हैं – श्री आदिनाथ जी, मत्स्येन्द्र, नाथ, साबर, अनन्द, भैरव, चौरन्गी, मिन नाथ, गोरक्ष नाथ, विरूपाक्ष, बीलेसय, मन्थन, भैरव, सिद्धि बुद्धै कान्ठादि, करन्तक, सुरानन्द, सिद्धिपाद, चरपति, कानेरि, पिज्यपाद, नात्यनाथ, निरन्जन, कपालि, विन्दुनाथ, काक चन्डीश्वर, अल्लामा, प्रभुदेव, घोदा, चोलि, तितिनि, भानुकि आदि ।

ये महासिद्ध महर्षि, मृत्यु को जीत कर अमृत्व को प्राप्त हुये हैं ।

जैसे घर मनुष्य की धूप से रक्षा करता है, उसी प्रकार हठ योग एक योगी की तीनों प्रकार के तपों की गरमी से रक्षा करता है । जो सदा योग में लगें हैं, यह हठ योग उन के लिये वैसे ही सहारा देता है जैसे सागर मन्थन में भगवान नें कछुये के रूप से पर्वत को सहारा दिया था ।

योगी को हठ योग के ज्ञान को छुपा कर रखना चाहिये, क्योंकि यह गुप्त होने से अधिक सिद्ध होता है और दिखाने से इस की हानि होती है ।

योगी को हठ योग एक शान्त कमरे में, जहां पत्थर, अग्नि, जल आदि से कोई हलचल न हो, वहां स्थित हो कर करना चाहिये और ऐसी जगह रहना चाहिये जहां अच्छे लोग रहते हैं, तथा खाने की बहुलता हो, आसानी से प्राप्त हो ।

कमरे में छोटा दरवाजा हो, कोई सुराख आदि न हों । न वह ज्यादा उँचा हो, न बहुत नीचा, गोबर से अच्छी तरह लिपा हो, और गन्दगी, कीडों आदि से मुक्त हो । उस के बाहर चबूतरा हो और आँगन आदि हो । हठ योग करने के स्थान में ऐसी खूबीयाँ हों तो अच्छा है, यह इस योग में सिद्ध महर्षियों ने कहा है ।

इस स्थान में बैठ कर, और सभी प्रकार के मानसिक उद्वेगों से मुक्त होकर साधक को योग साधना करनी चाहिये ।
योग इन छे कारणों से नष्ट हो जाता है – बहुत खाना, बहुत परिश्रम, बहुत बोलना, गलत नियमों का पालन जैसे बहुत सुबह ठंडे पानी से नहाना या देर रात को खाना या केवल फल खाना आदि, मनुष्यों का अत्याधिक संग, औऱ छटा (योग में) अस्थिरता ।

इन छे से सफलता शिघ्र ही प्राप्त होती है – हिम्मत, नीडरता, लगे रहना, ध्यान देना, विश्वास, और संगती से दूर रहना ।

इन दस आचरणों का पालन करना चाहिये – अहिंसा (किसी भी प्राणी की हिंसा न करना), सत्य बोलना, चोरी न करना, संयम, क्षमा, सहनशीलता, करुणा, अभिमान हीनता – दैन्य भाव, कम खाना और सफाई ।

योग के ज्ञाता जन यह दस नियम बताते हैं – तप, धैर्य रखना, भगवान में विश्वास, दान देना, भगवान का ध्यान करना, धर्म संवाद सुनना (पढना), शर्म, बुद्धि का प्रयोग, तपस्य करना और यज्ञ करना ।


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Re: Yoga For all
« Reply #3 on: December 16, 2016, 12:22:07 am »
Asanas आसन

1:- आसन हठ योग की सबसे पहली शाखा है, इसलिये सबसे पहले उस का वर्णन करते हैं । इसका अभ्यास स्थिर काया, निरोगता और शरीर का हलकापन पाने के लिये करना चाहिये ।

Swastika-āsana

अपने दोनो हाथों को अपने पट्टों के नीचे रख कर, अपने शरीर को सीधा रख, जब मनुष्य शान्ती से बैठता है तो उसे स्वतिक कहते हैं ।

Gomukha-āsana

जब अपने दायने ankle को अपने बायें ओर और अपने बायें ankle को अपने दायें ओर रखा जाये, जो गायें के मूँह जैसा दिखता है, उसे गोमुख आसन कहते हैं

Virāsana

एक पैर को दूसरे पट्ट पर रखा जाये और दूसरे पैर को इस पट्ट पर रखा जाये, इसे वीरासन कहते हैं ।

Kurmāsana

अपनी दायें ankle को anus के बायें ओर और बायें ankle को anus के दायें ओर रखा जाये, उस आसन को योगी कुर्मासन कहते हैं ।

Kukkuta āsana

पदमासन में बैठ कर, फिर हाथों के पट्टों के नीचे रख कर, जब योगी अपने आप को जमीन से उठाता है, हाथों के तलवों को धरती पर टिकाये हुये, तो उसे कुक्कुट आसन कहते हैं ।

Utāna Kurma-āsana

कुक्कुट आसन में बैठ कर, अपनी गरदन या सिर को पीछे से पकड कर, अगर जमीन पर पीठ लगा कर लेटा जाये, तो उसे उतान कुर्मासन कहते हैं, क्योंकि यह दिखने में कछुये जैसा लगता है ।

Dhanura āsana

दोनो हाथों से अपने पैरों के अगले भाग (उंगलीयों) को पकड कर, उन्हें (पैरों को) अपने कानो तक ले जाना, जैसे कोई धनुष खींच रहें हों, उसे धनुर आसन कहा जाता है । 

2:- मैं कुछ आसनों का वर्णन करता हूँ जिन्हें वौशिष्ठ जैसे मुनियों और मत्स्येन्द्र जैसे योगियों ने अपनाया है ।

Matsya-āsana

अपने पैर को अपने पट्ट (thigh) पर रख कर, अपने हाथ को पीठ की तरफ से ले जा कर उसे पकडना – जैसे दायने पैर को बायें पट्ट पर रख कर, अपने दायने हाथ को पीठ की तरफ से ले जा कर अपने दायने पैर को पकडना, और वैसे ही दूसरे पैर और हाथ से करना – इस आसन को मत्स्य आसन कहते हैं, और इसका वर्णन श्री मत्स्यानाथ जी ने किया था । इस से भूख बढती है, और यह बहुत सी भयानक बिमारियों से रक्षा में सहायक सिद्ध होता है । इस के अभ्यास से कुण्डली जागती है और यह मनुष्य के चन्द्रबिंदू से अमृत छटना रोकता है (इस विष्य में बाद में और बताया गया है) ।

Paschima Tāna

पैरों को जमीन पर सीधा कर के (साथ साथ लंबे रख करे), जब दोनो हाथों से पैरों की उँगलीयाँ पकडी जायें और सिर को पट्टों पर रखा जाये, तो उसे पश्चिम तन आसन कहते हैं । इस आसन से शरीर के अन्दर की हवा आगे से शरीर के पीछे के भाग की तरफ जाती है । इस से gastric fire को बढावा मिलता है, मोटापा कम होता है और मनुष्य की सभी बिमारियां ठीक होती हैं । (यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण आसन है)

Mayura-āsana

हाथों के तलवों को जमीन पर रखें और अपनी elbows को साथ साथ लायें । फिर पेट की धुन्नि (navel) को अपनी elbows के ऊपर रखें और इस प्रकार अपने भार को हाथों (elbows) पर टिकाते हुये, शरीर को डंडे के समान सीधा करें । इसे म्यूर आसन कहते हैं ।

इस आसन से जल्द ही सभी बिमारियां नष्ट हो जाती हैं, पेट के रोग मिट जाते हैं, और बलगम, bile, हवा आदि के विकारों को दूर करता है, भूख बढाता है और खतरनाख जहर का अन्त करता है ।


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Re: Yoga For all
« Reply #4 on: December 16, 2016, 12:22:43 am »
Sava-âsana

1: धरती पर मृत के समान लंबा लेटना, इसे शव आसन कहा जाता है । इस से थकावट दूर होती है और मन को आराम मिलता है ।

2: इस प्रकार भगवान शिवजी नें 84 मुख्य आसन बताये हैं । लेकिन उन में से पहले चार सबसे जरूरी हैं । यहां मैं उन का वर्णन करता हूँ ।

3: ये चार हैं – सिद्धासन, पद्मासन, सिंहासन और भद्रासन । इन में से भी सिद्धासन बहुत सुखदायी है – इसका सदा अभ्यास करना चाहिये ।

The Siddhâsana

1: अपने दायें पैर की एडी को अपने perineum (लिंग के नीचे की हड्डी) के साथ अच्छे से लगायें, और अपने दूसरी ऐडी को अपने लिंग के उपर रखें । अपनी ठोडी (chin) को अपनी छाती से लगायें और शान्ति से बैठें । अपनी इन्द्रियों को संयम कर, अपने माथे के बिच (eyebrows) की तरफ एक टक देखें । इसे सिद्धासन कहा जाता है – जो मुक्ति का द्वार खोलता है ।

2: इसे अपने दायने पैर को अपने लिंग (****) के उपर और बायें को उसके साथ रख कर भी किया जा सकता है ।

3: कुछ लोग इसे सिद्धासन कहते हैं, कुछ वज्रासन भी कहते हैं । दूसरे कुछ लोग इसे मुक्तासन या गुप्तासन भी कहते हैं ।

4: जैसे कम खाना यमों में पहला यम है, और जैसे अहिंसा (किसी भी प्राणी की हिंसा न करना) पहला नियम है, उसी प्रकार ऋषियों ने सिद्धासन को सभी आसनों में प्रमुख बताया है ।

5: 84 आसनों में सिद्धासन का सदा अभ्यास करना चाहिये क्योंकि यह 72000 नाडियों को शुद्ध करता है ।

6: स्वयं पर ध्यान करते हुये, कम खाते हुये, और सिद्धासन का बारह वर्ष तक अभ्यास कर योगी सफलता प्राप्त कर लेता है ।

7: जब सिद्धासन में सफलता प्राप्त हो चुकी हो, और केवल-कुम्भक द्वारा प्राण वायु शान्त और नियमित हो चुकी हो, तो दूसरे किसी आसन की कोई आवश्यकता नहीं है ।

8: केवल सिद्धासन में ही अच्छी तरह स्थिर हो जाने से मनुष्य को उन्मनी प्राप्त हो जाती है और तीनो बंध भी स्वयं ही पूर्ण हो जाते हैं ।

9: सिद्धासन जैसा कोई आसन नहीं है, और ‘केवल’ जैसा कोई कुम्भक नहीं है । केचरी जैसी कोई मुद्रा नहीं है, और नाद (अनहत नाद) जैसी कोई लय नहीं है ।


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Re: Yoga For all
« Reply #5 on: December 16, 2016, 12:24:20 am »
सूर्य नमस्कार



(1) पहले सावधान की मुद्रा में खड़े हो जाएँ। फिर दोनों हाथों को कंधे के समानांतर उठाते हुए दोनों हथेलियों को ऊपर की ओर ले जाए। हथेलियों के पृष्ठ भाग एक-दूसरे से चिपके रहें। फिर उन्हें उसी स्थिति में सामने की ओर लाएँ। तत्पश्चात नीचे की ओर गोल घुमाते हुए नमस्कार की मुद्रा में खड़े हो जाएँ।

(2) श्वास भरते हुए दोनों हाथों को कानों से सटाते हुए ऊपर की ओर तानें तथा कमर से पीछे की ओर झुकते हुए भुजाओं और गर्दन को भी पीछे की ओर झुकाएँ। यह अर्धचक्रासन की स्थिति मानी गई है।

(3) तीसरी स्थिति में श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए आगे की ओर झुकें। हाथ गर्दन के साथ, कानों से सटे हुए नीचे जाकर पैरों के दाएँ-बाएँ पृथ्वी का स्पर्श करें। घुटने सीधे रहें। कुछ क्षण इसी स्थिति में रुकें। इस स्थिति को पाद पश्चिमोत्तनासन या पादहस्तासन की स्थिति कहते हैं।

(4) इसी स्थिति में हथेलियाँ भूमि पर टिकाकर श्वास को भरते हुए दाएँ पैर को पीछे की ओर ले जाएँ। छाती को खींचकर आगे की ओर तानें। गर्दन को ऊपर उठाएँ। इस मुद्रा में टाँग तनी हुई सीधी पीछे की ओर और पैर का पंजा खड़ा हुआ रहना चाहिए। इस स्थिति में कुछ समय रुकें।

(5) श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए हुए बाएँ पैर को भी पीछे ले जाएँ। दोनों पैरों की एड़ियाँ परस्पर मिली हुई हों। पीछे की ओर शरीर को खिंचाव दें और एड़ियों को पृथ्वी पर मिलाने का प्रयास करें। नितम्बों को अधिक से अधिक ऊपर उठाएँ। गर्दन को नीचे झुकाकर ठोड़ी को कंठ में लगाएँ।

(6) श्वास भरते हुए शरीर को पृथ्वी के समानांतर, सीधा साष्टांग दंडवत करें और पहले घुटने, छाती और ठोड़ी पृथ्वी पर लगा दें। नितम्बों को थोड़ा ऊपर उठाएँ। श्वास छोड़ दें। श्वास की गति सामान्य रखें।

(7) इस स्थिति में धीरे-धीरे श्वास को भरते हुए छाती को आगे की ओर खींचते हुए हाथों को सीधे कर दें। गर्दन को पीछे की ओर ले जाएँ। घुटने पृथ्वी का स्पर्श करते हुए तथा पैरों के पंजे खड़े रहें। इस स्थिति को भुजंगासन की स्थिति कहते हैं।

( यह स्थिति पाँचवीं स्थिति के समान है। जबकि हम ठोड़ी को कंठ से टिकाते हुए पैरों के पंजों को देखते हैं।

(9) यह स्थिति चौथी स्थिति के समान है। इसमें पीछे ले जाए गए दाएँ पैर को पुन: आगे ले आएँ।

(10) यह स्थिति तीसरी स्थिति के समान हैं। फिर बाएँ पैर को भी आगे लाते हुए पुन: पाद पश्चिमोत्तनासन की स्थिति में आ जाएँ।

(11) यह स्थिति दूसरी स्थिति के समान हैं। जिसमें पाद पश्चिमोत्तनासन खोलते हुए और श्वास भरते हुए दोनों हाथों को ऊपर ले जाएँ। उसी स्थिति में हाथों को पीछे की ओर ले जाएँ साथ ही गर्दन तथा कमर को भी पीछे की ओर झुकाएँ अर्थात अर्धचक्रासन की मुद्रा में आ जाएँ।

(12) यह स्थिति पहली स्थिति की भाँति रहेगी। अर्थात नम:स्कार की मुद्रा।

बारह मुद्राओं के बाद पुन: विश्राम की स्थिति में खड़े हो जाएँ। अब इसी आसन को पुन: करें। पहली, दूसरी और तीसरी स्थिति उसी क्रम में ही रहेगी लेकिन चौथी स्थिति में पहले जहाँ दाएँ पैर को पीछे ले गए थे वहीं अब पहले बाएँ पैर को पीछे ले जाते हुए यह सूर्य नमस्कार करें।

सावधानी : कमर एवं रीढ़ के दोष वाले साधक न यह योग न करें। सूर्य नमस्कार की तीसरी व पाँचवीं स्थितियाँ सर्वाइकल एवं स्लिप डिस्क वाले रोगियों के लिए वर्जित हैं। कोई गंभीर रोग हो तो योग चिकित्सक की सलाह से ही सूर्य नमस्कार करें।

लाभ : सूर्य नमस्कार अत्यधिक लाभकारी है। इसके अभ्यास से हाथों और पैरों का दर्द दूर होकर उनमें सबलता आती है। गर्दन, फेफड़े तथा पसलियों की माँसपेशियाँ सशक्त हो जाती हैं, शरीर की फालतू चर्बी कम होकर शरीर हल्का-फुल्का हो जाता है।

सूर्य नमस्कार के द्वारा त्वचा रोग समाप्त हो जाते हैं अथवा इनके होने की संभावना समाप्त हो जाती है। इस अभ्यास से कब्ज आदि उदर रोग समाप्त हो जाते हैं और पाचनतंत्र की क्रियाशीलता में वृद्धि हो जाती है। इस अभ्यास के द्वारा हमारे शरीर की छोटी-बड़ी सभी नस-नाड़ियाँ क्रियाशील हो जाती हैं, इसलिए आलस्य, अतिनिद्रा आदि विकार दूर हो जाते हैं।


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Re: Yoga For all
« Reply #6 on: December 16, 2016, 12:25:54 am »
Padmâsana


1:- अपने दायें पैर को अपने बायें पट्ट पर रख कर, और बायें पैर को अपने दायें पट्ट पर रख कर, अपने हाथों को पीछे से ले जाकर पैरों की उंगलीयों को पकड कर बैठना । फिर अपनी ठोडी को छाती से लगाना और अपने नाक के अगले भाग की तरफ देखना । इसे पद्मासन कहा जाता है, यह साधक की बिमारियों का नाशक है ।

2:- अपने पैरों को पट्टों पर रख कर, पैरों के तलवे ऊपर की ओर, और हाथों को पट्टों पर रख कर, हाथों के तलवो भी ऊपर की ओर ।

3:- नाक के अगले भाग की तरफ देखते हुये, अपनी जीभ को ऊपर के दाँतों की जड पर टीका कर, और ठोडी को छाती के साथ लगाते हुये, धीरे से हवा को ऊपर की ओर खींच कर ।

4:- इसे पद्मासन कहा जाता है, यह सभी बिमारियों का नाशक है । यह सब के लिये प्राप्त करना कठिन है, लेकिन समझदार लोग इसे सीख सकते हैं ।

5:- दोनो हाथों को अपनी गोदी में साथ साथ रख कर, पद्मासन करते हुये, अपनी ठोडी को छाती से लगा कर, और भगवान पर ध्यान करते, अपनी अपान वायु को ऊपर का तरफ खीचते, और फिर साँस लेने के बाद नीचे को धकेलते – इस प्रकार प्राण और अपान को पेट में मिलाते, योगी परम बुद्धि को प्राप्त करता है शक्ति के जागने के कारण ।

6:- जो योगी, इस प्रकार पद्मासन में बैठे, अपनी साँस पर काबू पा लेता है, वह बंधन मुक्त है, इस में कोई शक नहीं है ।


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Re: Yoga For all
« Reply #7 on: December 16, 2016, 12:27:25 am »
The Simhâsana

1: दोनो ऐडीयों को अपने लिंग के नीचे वाली हड्डी से लगा कर ।

2: अपने हाथों को अपने पट्टों पर रख कर, अपने मूँह को खुला रख कर, और अपने मन को संयमित कर, नाक के आगे वाले भाग की तरफ देखते हुये ।

3: यह सिंहासन है, जिसे महान योगी पवित्र मानते हैं । यह आसन तीन बंधों की पूर्ति में सहायक होता है ।


The Bhandrâsana

1: दोनो ऐडीयों को अपने लिंग के नीचे वाली हड्डि से लगा कर (keeping the left heel on the left side and the right one on the right side), पैरों को हाथों से पकड कर एक दूसरे से अच्छे से जोड कर बैठना । इसे भद्रासन कहा जाता है । इस से भी सभी बिमारियों का अन्त होता है ।

2: योग ज्ञाता इसे गोरक्षासन कहते हैं । इस आसन में बैठने से थकावट दूर होती है ।

3: यह आसनों का वर्णन था । नाडियों को मुद्राओं, आसनों, कुम्भक आदि द्वारा शुद्ध करना चाहिये ।

4: नाद पर बारीकी से ध्यान देने से, ब्रह्मचारी, कम खाता और अपनी इन्द्रियों को नियमित करता, योग का पालन करता हुआ सफलता को एक ही साल में प्राप्त कर लेता है – इस में कोई शक नहीं ।

5: सही खाना वह है, जिस में अच्छे से पके, घी और शक्कर वाले खाने से, भगवान शिव को अर्पित करने के पश्चात खाकर ¾ भूख ही मिटाई जाये ।


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Re: Yoga For all
« Reply #8 on: December 16, 2016, 12:28:16 am »
योग और मोटापा


........अब आप भी योगासन से कर सकते है शरीर का भार........|

मनुष्य को प्रकृति की ओर से संतुलित और सुडौल शरीर मिलता है, पर वह गलत रहन-सहन, बुरी आदत तथा खान-पान में अनियमितता के कारण इस शरीर को बेडौल बना लेता है। वैज्ञानिक रूप से मोटापा हम उसे कहते हैं जिसमें शरीर का वजन ऊँचाई के मान से अधिक होता है।आधुनिक समय में यह एक बीमारी के रूप में तेजी से फैल रहा है।

इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हम शारीरिक श्रम उतना नहीं करते, जितना कि हमारे द्वारा खाए गए खाने के बाद किया जाना चाहिए। जो ऊर्जा शरीर में ज्यादा उत्पन्ना होकर अतिरिक्त रह जाती है, वह शरीर के उन्हीं भागों में चर्बी के रूप में एकत्र हो जाती है, जिनका उपयोग हम अधिक नहीं करते हैं।

कूल्हे व पीठ का भाग बढ़ जाता है, पेट के लटकने से मांसपेशियाँ ढीली हो जाती हैं, हाथों व जाँघों का थुलथुला हो जाना- ये सभी लक्षण मोटापे के रूप में दिखते हैं। मोटे व्यक्ति अधिकांशतः कब्ज के कारण पीड़ित रहते हैं और उन्हें मधुमेह, उच्च रक्तचाप, दिल की बीमारी, जोड़ों का दर्द, गठिया, घुटनों में दर्द की संभावना भी अधिक होती है।

आपका कल्याण हो .......


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Re: Yoga For all
« Reply #9 on: December 16, 2016, 12:28:48 am »
मोटापा दूर करने के उपाय


सुबह या शाम कम से कम तीन किलोमीटर तेज चलें। इसके अलावा दौड़ लगाना, तैरना, खेलना, साइकल चलाना भी लाभदायक होता है। योगाभ्यास सर्वोत्तम उपाय इसलिए माना जाता है क्योंकि इससे मन-मस्तिष्क दोनों स्वस्थ रहते हैं। कपालभाति प्रपायाम १५ मिनट करना चाहिये।

योगासन के साथ-साथ भोजन का ध्यान रखना भीजरूरी है। हरी पत्तेदार सब्जी-भाजी, मौसमी फल तथा फलों के रस का सेवन उपयोगी रहता है। भोजन में सलाद, सूप, छाछ, दही यदि लिया जाए व भोजनोपरांत पपीता, अमरुद और फलों का रस (आम रस नहीं) लिया जाए तो पाचन में सहयोग मिलता है।

भूख लगने पर ही भोजन करें और भूख से थोड़ा कम खाना खाएँ। पानी अधिक पीएँ। शकर, नमक, मीठा, घी, तेल का उपयोग कम किया जाए तो भी बेहतर होगा। भोजन के बाद वज्रासन में पाँच-दस मिनट बैठने से पाचन क्रिया ठीक होती है।
योगासन के समय मन व साँस को आसन व क्रियाओं के साथ रखना चाहिए। लंबी, गहरी साँस के साथ प्रत्येक क्रिया करना चाहिए जिससे पृथक-पृथक अंगों का स्ट्रेच और रिलेक्स (सिकुड़न और फैलाव) होगा व सभी अंगों को लाभ मिलेगा।
आसन करने से पेहले किसि योग शिक्शक से पुरि जानकारि अवश्य ले| घर पर करने से लाभ मिलेगा मगर आपका तरिका सहि होना चाहिये|


== मोटापा कम करने के लिए ये योगासन उपयोगी हैं ==

त्रिकोणासन
कोणासन
पशुविश्रामासन
उत्तानपादासन
अर्धहलासन
पादव्रित्तासन
पवनमुक्तासन
द्विचक्रिकासन
सीधा नौकासन
उल्टा नौकासन (पेट पे लैट के करनेवाला आसन स्रिया ना करे)
सूर्य नमस्कार


आपका कल्याण हो .......


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Re: Yoga For all
« Reply #10 on: December 16, 2016, 12:29:21 am »
मोटापा घटाने के लिए नानाप्रकार के आशन हैं , लेकिन तुम्हारी रूचि को देखते हुए तुमको एक सरल आशन बताता हूँ , जिसका जिक्र पहले हो चुका है . तुम पुनः उस आशन की विधि को ठीक तरह से पढो तुम्हारी समस्या हल हो जायेगी

सूर्यनमस्कार

लाभ : सूर्य नमस्कार अत्यधिक लाभकारी है। इसके अभ्यास से हाथों और पैरों का दर्द दूर होकर उनमें सबलता आती है। गर्दन, फेफड़े तथा पसलियों की माँसपेशियाँ सशक्त हो जाती हैं, शरीर की फालतू चर्बी कम होकर शरीर हल्का-फुल्का हो जाता है।


Pranayama

** आसन के में स्थिरता आ जाने पर, योगी को नियमित कम खाते हुये, प्राणायम का अभ्यास करना चाहिये।

** साँस के विचलित हो जाने पर मन भी आशान्त हो जाता है। साँस को नियमित कर, योगी मन की स्थिरता प्राप्त करता है।

** जब तक साँस शरीर में रहती है, उसे जीवित कहा जाता है। साँस का इस शरीर से निकल जाना ही मृत्यु होता है। इसलिये साँस को संयम करना जरूरी है।

** साँस अर्थात प्राण बीच वाली नाडी में नहीं जा पाते, क्योंकि वह नाडी खुली नहीं है। तो सफलता कैसे प्राप्त होगी और समाधि का आवस्था कैसे मिल पायेगी।

** जब सभी नाडियां जो अशुद्धता से भरी पडी हैं, शुद्ध हो जाती हैं, तो योगी प्राण वायु को वश में कर लेता है।

** इस लिये सात्विक बुद्धि से हर रोज प्राणायम करना चाहिये ताकि नाडियां शुद्ध हो पायें।


Methods of performing Pranayama

** पद्मासन में बैठ कर योगी को अपनी दायीं नासिका से हवा भरनी चाहिये, और उसे अपने क्षमता के अनुसार अन्दर रोक कर, फिर धीरे से अपनी बायीं नासिका से छोडना चाहिये।

** फिर उलटा, बायें से अन्दर और दायें से बाहर – उसी प्रकार कुम्बक करना चाहिये।

** इस प्रकार एक से अन्दर लेकर, और अन्दर क्षमता अनुसार रोक कर, दूसरी नासिका से बाहर निकालना धीरे धीरे, जबर दस्ति नहीं।

** इस प्रकार, एक दूसरी नासिका द्वारा अभ्यास करते हुये, सभी की सभी 72000 नाडियां 3 महिनों में शुद्ध हो जाती हैं।

** इन कुम्भक को धीरे धीरे बढाते हुये दिन रात में चार बार करना चाहिये, जब तक एक बार की संख्या 80 न हो जाये और सारे दिन की संख्या 320 न हो जाये।

** शुरु में पसीना आता है, फिर बीच की stage में कम्पकपी होती है, और अन्त की स्थिति में स्थिरता प्राप्त हो जाती है। तब साँस को स्थिर, और हलचल रहित कर देना चाहिये।

** इस अभ्यास के परिश्रम से जो पसीना आये उसे अपने शरीर में ही मल लेना चाहिये क्योंकि एसा करने से शरीर मजबूत होता है।

** पहले के अभ्यास में दूध और घी युक्त आहार भरपूर होता है। जब साधना अच्छे से स्थिर हो जाये तो ऐसी कोई पाबंधी नहीं है।

** जैसे शेर, हाथी, चिते धिरे धिरे ही अपने वश में किये जाते हैं, उसी प्रकार साँस भी धीरे धीरे करते अपने वश में किया जाता है – इस में जल्दबाजी करना खतरनाख है।

** जब प्राणायम को अच्छे से किया जाता है तो वह सभी बिमारियों को मिटा देता है, लेकिन गलत अभ्यास बिमारिया उत्पन्न करता है।

** हिचकी आना, दम घुटना, खाँसी आना, सर या कानों या आँखों में दर्द आदि बिमारियाँ प्राण वायु के हिलने विचलित होने से ही उत्पन्न होती हैं।

** वायु को सही ढंग से ही निकालना चाहिये, और कोशलता से सही ढंग से भरना चाहिये, और जब उसे सही प्रकार से अन्दर रोका जाता है तो सफलता प्राप्त होती है।

** जब नाडियाँ शुद्ध हो जाती हैं, और बाहर भी उसके चिन्ह दिखने लगें, जैसे की पतला शरीर, चमकता रंग आदि तो सफलता प्राप्त हो रही है इस पर विश्वास करना चाहिये।

** अशुद्धता के मिट जाने पर, वायु को अपनी मरजी के अनुसार अन्दर रोका जा सकता है, भूख बढती है, दैविक ध्वनि जागति है और शरीर निरोग हो जाता है।

** अगर शरीर में ज्यादा मोटापा यां बलगम आदि हैं, तो छे प्रकार की क्रियायें करनी चाहिये पहले।

** लेकिन जिन्हें यह सब नहीं हैं, उन्हें यह नहीं करनी चाहिये।

** यह छ क्रियायें हैं धौती, बस्ती, तराटक, नौती, कपाल भाती।

** यह छे क्रियायें जिस से शरीर साफ होता है, गुप्त रखनी चाहिये। इन से बहुत अच्छे फायदे होते हैं और इन्हें उत्तम योगी गण बहुत ही इमानदारी से करते हैं।


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Re: Yoga For all
« Reply #11 on: December 16, 2016, 12:29:54 am »
The Dhauti

-- कपडे की पट्टी, 3 इन्च चौडी और 15 मीटर लम्बी, कोसे पानी से नमाई हुई, उसे धीरे धीरे निगला जाता है (एक सिरा बाहर रहता है) और फिर बाहर निकाला जाता है। इसे धौती कर्म कहते हैं।

-- इस में कोई शक नहीं कि खाँसी, दम घुटना, आदि 20 प्रकार की बिमारियाँ धौती से ठीक हो जाती हैं।

The Basti

-- पेट तक पानी में बैठ कर, एक 6 इन्च लम्बी, आधा इन्च चौडी खोखली पाईप को, anus में डाला जाता है और फिर (anus को) सकोडा और बाहर का ओर निकाला जाता है। इस धोने की क्रिया को बस्ति कर्म कहते हैं।

-- इसे करने से कई बिमारियां जो वायु, पित और कफ आदि के विकारों से उत्पन्न होती हैं, ठीक हो जाती हैं।

-- पानी में बस्ति करने से, शरीर के धातु, इन्द्रियां, मन शान्त रहते हैं। इस से शरीर में चमक आने लगती है और भूख बढती हैं, और सभी विकार आदि मिट जाते हैं।

The Neti

-- धागें से बनी एक रस्सि, 6 इन्च लम्बी, नाक द्वारा डाल कर, मूँह से निकाली जाती है। इसे योग ज्ञाता नेती क्रिया कहते हैं।

-- इससे दिमाग शुद्ध होता है और दैविक दृष्टि मिलती है। इस से मूँह औऱ खोपडी के हिस्से के रोग दूर होते हैं।

The Tratika

-- शान्त हो कर, एक ही निशान पर एकटक देखते रहना, जब तक आँखों में पानी न आ जाये। इसे आचार्य गण तराटक कहते हैं।

-- इससे आँखों के रोग दूर होते हैं, और आलस मिटता है। इसे बहुत गुप्त रखना चाहिये जैसे गहनों की डब्बा।

The Nauli

-- अपने पैरों के बल, ऐडीयों को उठा कर बैठ कर, हाथों के तलों को धरती पर रखे हुये। इस प्रकार झुके हुये, अपने पेट को जबरदस्ती दायें से बायें तक लेजाना, जैसे उल्टी कर रहे हों। इसे नौली कर्म कहा जाता है।

-- इस से dyspepsia ठीक होता है, भूख लगती है, हाजमा ठीक होता है। यह लक्ष्मी की ही तरह सभी प्रसन्नता देता है और सभी विकारों को सुखा देता है। हठ योग में यह बहुत ही उत्तम क्रिया है।

योगाचार्य
"गढ़वाल सम्राट " पंवार विपिन चन्द्र पाल सिंह


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Re: Yoga For all
« Reply #12 on: December 16, 2016, 12:30:21 am »
The Kapala Bhati

-- जब साँस लेना और निकालना बहुत जल्दि जल्दि किये जायें, तो वह बलगम के सभी विकारों को मिटा देता है। इसे कपाल भाती कहा जाता है।

-- इस प्रकार जब इन छे क्रियाओं द्वारा शरीर को बलगम आदि से उत्पन्न मोटापे आदि से मुक्त करने के बाद प्राणायम किया जाता है तो आसानी से सफलता प्राप्त होती है।

-- कुछ आचार्य प्राणायम के अतिरिक्त और किसी क्रिया नहीं बताते क्योंकि वे मानते हैं कि सभी अशुद्धियां प्राणायम द्वारा ही सूख जाती हैं।

Gija Karani

-- अपान वायु को गले तक लाकर, उल्टि की जा सकती है। धीरे धीरे इस से नाडियों का ज्ञान होता है। इसे गज करनी कहा जाता है।

-- ब्रह्मा आदि देव सदा प्राणायाम में लगे हैं, और इसके द्वारा मृत्यु के भय से मुक्त होते हैं। इसलिये, सदा प्राणायम का अभ्यास करना चाहिये।

-- जब तक शरीर में साँस को रोका हुआ है, मन हलचल रहित है, और दृष्टि आँखों के बाच में स्थित है – तब तक मृत्यु का कोई भय नहीं है।

-- जब सभी नाडियां प्राण को भली भाँति काबू में कर लेने से शुद्ध हो जाती हैं, तो प्राण वायु सुसुम्ना नाडी के द्वार को आसानी से भेद कर उस में प्रवेश कर जाता है।

Manomani

-- जब वायु बाच वाली नाडी में आसानी से चलती है, तो मन स्थिर हो जाता है। इस स्थिति को मनोमनि कहते हैं जो तब प्राप्त होती है जब मन शान्त हो जाता है।

-- इसे प्राप्त करने के लिये विभिन्न कुम्भक किये जाते हैं उनको द्वारा जो योग में प्रवीण हैं, क्योंकि कुम्भक के अभ्यास से ही विशिष्ट सफलता प्राप्त होती है।


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Re: Yoga For all
« Reply #13 on: December 16, 2016, 12:30:46 am »


विभिन्न प्रकार के कुम्भक

-- कुम्भक आठ प्रकार के होते हैं - सूर्य भेदन, उजई, सीतकरी, सितली, भस्त्रिका, भ्रमरि, मूर्च्छा और प्लविनि।

-- पूरक के अन्त में जल्नधर बन्ध करना चाहिये, और कुम्भक के अन्त में और रेचक के शुरु में उदियान बन्ध नहीं करना चाहिये। (पूरक कहते हैं बाहर से भीतर हवा भरने को - अन्दर साँस लेने को)।

-- कुम्भक कहते हैं साँस को अन्दर रोक कर रखने को (हवा को अन्दर बंद कर के रखना)। रेचक साँस को बाहर छोडने को कहते हैं। पूरक, कुम्भक और रेचक की जानकारी सही जगह दी जायेगी और इसे ध्यान से समझना और लागू करना चाहिये। अपने नीचे के भाग को ऊपर की ओर खींच कर (मूल बन्ध) और अपनी गर्दन को अन्दर की ओर खींच कर (ठोडी को छाती से लगा कर - जल्नधर बन्ध) और अपने पेट को अन्दर की ओर खींच कर - यह करने पर प्राण ब्रह्म नाडी (सुशुम्न) की तरफ बढता है (उसमें प्रवेश करने की चेष्टा करता है)। (बीच वाली नाडी को योगी जन सुशुम्न कहते हैं। उस के साथ में दो अन्य जो नाडियां होती हैं जो रीड की हडडी के साथ चलती हैं उन्हें ईद और पिंग नाडीयाँ कहा जाता है।)

-- अपान वायु को ऊपर को खींच कर और प्राण वायु को गर्दन में से होती नीचे की ओर धकेल कर योगी जरा से मुक्त हो ऐसे यौवन अवस्था को प्राप्त कर लेता है मानो सोलंह साल का हो। (प्राण का स्थान हृदय है औऱ अपान का स्थान anus है। समान का स्थान पेट है, उदान का गला स्थान है और व्यान का स्थान सारा शरीर है - यह पाँच पॅकार की वायु हैं जो मनुष्य को जीवित रखती हैं।)


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Re: Yoga For all
« Reply #14 on: December 16, 2016, 12:31:31 am »
सूर्य भेदन

** किसी भी आरामदायक आसन को ग्रहण कर के बैठें। फिर वायु को धीरे धीरे right नासिका से अन्दर लें।

** फिर उस वायु को अन्दर रोक कर रखें, ताकी वह नाखूनों से ले कर बालें तक सारे शरीर को भर दे और फिर धीरे धीरे उसे दूसरी (left) नासिका से बाहर निकालें। (इसे एक के बाद एक करना है। जिस नासिका से अन्दर लें, दूसरी से निकालें और फिर उस दूसरी से अन्दर लें औऱ पहली वाली से निकालें।)

** इस उत्तम सूर्य भेदन से माथा साफ होता है, वत के रोग दूर होते हैं, कीडे खत्म होते हैं इसे बार बार करना चाहिये।

** मैं इस योग अभ्यास का वर्णन करता हूँ ताकी योगी जन सफल हों। बुद्धिमान मनुष्य को सुबह जल्दि उठना चाहिये (चार बजे सुबह)

** फिर अपने गुरु को अपने सिर से नमस्कार कर, और अपने देव को अपने मन में याद कर, साफ सफाई आदि क्रम से मुक्त हो, अपना मूँह साफ कर, फिर अपने शरीर पर भस्म लगानी चाहिये।

** एक साफ स्थान पर, साफ कमरा या फिर मनोहर जमीन पर उसे नरम आसन बिछा कर उस पर बैठना चाहिये और अपने मन में अपने गुरु और अपने देव अथवा देवी को याद करना चाहिये।

** अपने आसन स्थान की प्रशसा कर, यह प्रण लेना चाहिये की भगवान की कृपा से आज मैं समाधि प्राप्त करने के लिये प्राणायम करूँगा। उसे भगवान शिवजी को प्रणाम करना चाहिये ताकी उसे अपने आसन और योग में सफलता प्राप्त हो।

** नागों के भगवान, हजारों सिरों वाले भगवान शिवजी को प्रणाम है, जो अद्भुत मणियों से सुशोभित हैं और जिन्होंने इस संपूर्ण संसार को संभाला हुआ है, उसका पालन करते हैं, अनन्त हैं। इस प्रकार भगवान शिव जी की पूजा कर उसे आसन का अभ्यास करना आरम्भ करना चाहिये, और जब थकावट हो जाये तो शव आसन का अभ्यास करना चाहिये। अगर थकावट न हो तो शव आसन न करे।

** कुम्भक शुरु करने से पहले विपरीत करनी मुद्रा करनी चाहिये, ताकी वह जल्नधर बन्ध को आसानी से कर पाये।

** थोडा से जल पी कर उसे प्राणायम का अभ्यास आरम्भ करना चाहिये, योगिन्दों को नमस्कार कर के, जैसा की भगवान शिव जी नें कुर्म पुराण में बताया है।

** जैसे भगवान शिव नें कहा है की योगिन्द्रों के नमस्कार कर के, और उन के शिष्यों को, औऱ गुरु विनायक को नमस्कार कर के, फिर योगी को शान्त मन से मुझ में एक हो जाना चाहिये।

** अभ्यास करते समय असे सिद्धासन में बैठना चाहिये, और फिर बन्ध और कुम्भक करना आरम्भ करना चाहिये। पहले दिन उसे 10 कुम्भकों से शुरु करना चाहिये और हर रोज 6 बढा देने चाहिये।

** शान्त मन से 80 कुम्भक एक बार में करने चाहिये - पहले चन्द्र नासिका (left nostril) से शुरु करते हुये और उसके बाद सूर्य (right) नासिका से।

** बुद्धिमान लोगों ने इसे अनुलोम विलोम कहा है। इस सूर्य भेदन का अभ्यास करते हुये, साथ में बन्धों के, बुद्धिमान मनुष्य को उज्जई और फिर सीतकरी सीतली और भस्त्रिका करने चाहिये, दूसरे प्रकार के कुम्भक चाहे वह न करे।

** उसे मुद्राओं का ठीक से अभ्यास करना चाहिये जैसे उसके गुरु ने बताया हो। फिर पद्मासन में बैठ कर उसे अनहत नाद को ध्यान से सुनना चाहिये।

** जो भी वह कर रहा है, उस के फल को उसे भक्तिपूर्वक भगवान पर छोड देना चाहिये। इस अभ्यास के समाप्त होने पर उसे गरम पानी से स्नान करना चाहिये।

** इस स्नान के बाद दिन के कार्य कुछ देर के लिये रुक जाने चाहिये। दोपहर को भी अभ्यास के बार थोडा आराम करना चाहिये और फिर खाना खाना चाहिये।

** योगीजन को सदा स्वस्थ भोजन करना चाहिये, कभी अस्वस्थ करने वाला नहीं। रात के खाने के बार उसे Ilachi or lavanga लेना चाहिये।

** कईयों को कपूर और पान का पत्ता पसंद है। योगीयों को प्राणायम करने के पश्चात पान का पत्ता बिना किसी औऱ चीजों के (जैसे कथा आदि) अच्छा है।

** खाना खाने के बार उसे अध्यात्मिक पुसतकें पढनी चाहिये, या पुराण सुनना चाहिये या भगवान का नाम लेना चाहिये।

** शाम में उसे पहले की ही भाँती अभ्यास करना चाहिये। सूर्य के अस्त होने के एक घंटा पहले अभ्यास शुरु करना चाहिये।

** फिर शाम की संध्या उसे अभ्यास करने के पश्चात करनी चाहिये। अर्ध रात्रि में सदा हठ योग का अभ्यास करना चाहिये।

** विपरीत करनी शाम में और रात में करनी अच्छी है लेकिन खाने के बिल्कुल बाद नहीं क्योंकि वरना उस से लाभ नहीं होता।


 

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